अध्याय 140

हड्डियाँ जमा देने वाली ठंड मेरे शरीर के हर रोमछिद्र में ऐसे चुभ रही थी जैसे हज़ारों स्टील की सुइयाँ। मेरे फेफड़े सिकुड़ गए, और मैंने पानी का एक घूंट-सा भरकर घुटते हुए निगल लिया। ज़ोर-ज़ोर की खाँसी भी झील के पानी ने दबा दी, और घुटन की लहर मेरे ऊपर समुद्री ज्वार की तरह टूट पड़ी।

मैं बदहवास होकर जूझी,...

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